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आचार्य आशीष पाण्डेय

Crime

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आचार्य आशीष पाण्डेय

Crime

काश मिले होते

काश मिले होते

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सफ़र में कभी भी अगर साथ होते

न तुम दूर जाते न हम दूर जाते 

न तुम याद में यूं न हम याद मे यूं

सताता तुम्हें तुम न हमको सताते।।


कभी पास आते ग़ज़ल हम सुनाते

जो तुम मुस्कुराते तो हम मुस्कुराते

बहारों की मलिका वो शर्मा ही जाती

तेरे रूप की जो प्रसंशा सुनाते।।


खिले चांद की चांदनी रात रानी

रचेंगे तभी इश्क़ की हम कहानी

जहां दुश्मनों की निगाहें न जाती

उसी दिल के आंगन में तुमको छुपाते।।


तभी प्यार बढ़ता जो बदनाम होते

बहानें बनाकर मुलाकात करते

कभी क़ैद होते तो छुप छुप के रोते

कहीं तुम तड़पते कहीं हम तड़पते।।


जो हो कैद जाते मुलाकात होती

बहुत प्यार होता बहुत बात होती

गले मैं लगाकर गले तुम लगाकर

बहुत देर रोता बहुत देर रोती

बहे आंसुओं को मैं हंस चूम लेती

जो तुम चूम लेती तो हम चूम लेते।।


हुआ जो भुलाएं न आंसू बहाएं

न तुम ही सताओ हम ही सताएं

चले आइए अब न यूं दूर बैठें

जो बंधन हटे तो क्यूं मजबूर बैठें

गले तुम लगा के ज़रा मुस्कुराते

मुहब्बत के मालिक मुहब्बत सिखाते।।


 जरा मुस्कुरा दो गले से लगा लो

जो सोयी मुहब्बत उसे फिर जगा लो

जो अंजाम होगा जो ईनाम होगा

यहां नाम होगा या बदनाम होगा

जहां हो खफा तो खुदा साथ देते

तो सच्ची मुहब्बत के हकदार होते।।


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