कागज-कलम
कागज-कलम
मेरी कलम कुछ कहना चाहती है
दिल का हाल बयान करना चाहती है
इस कोरे कागज को भर देना चाहती है
विचारों को शब्दों में पिरो देना चाहती है
इस कोरे कागज को एक नया रूप देना चाहती है
उसकी पहचान बनाना चाहती है
अपनी स्याही से उसको रंगीन बनाना चाहती है
उसके महत्व को बढ़ाना चाहती है
पर कभी कलम खुद को अकेला पाती है
बिना कागज के खुद को अधूरा समझती है
ना होता कागज तो क्या वो लिख पाती?
मानवों के विचारो का आदान प्रदान कर पाती?
ये इतिहास क्या दुनिया जान पाती?
धार्मिक पुस्तकों को पढ़ पाती?
वैज्ञानिक तथ्य क्या समझ पाती?
लेखा- जोखा क्या संभाल पाती?
ये सोच कर ही कलम मेरी झूम जाती है
कोरे कागज को रंग देने का इंतज़ार करती है
मेरे हाथों में आने के लिए बेकरार रहती है
हर बार मेरी कलम कुछ कहना चाहती है
