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कल्पना रामानी

Drama

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कल्पना रामानी

Drama

जंगलों में

जंगलों में

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सोच में डूबा हुआ मन

जब उतरता जंगलों में।

वे हरे जीवन भरे दिन

याद करता जंगलों में।


कल जहाँ तरुवर खड़े थे

ठूँठ दिखते उस जगह।

रात रहती है वहाँ केवल

नहीं होती सुबह।


और कोई एक दीपक

भी न धरता जंगलों में।


घर से ले जाती मुझे थीं

जो वहाँ पगडंडियाँ।

अब चुराती हैं नज़र

कैसे करें हालत बयाँ। 


जानती हूँ मैं मगर 

हर प्राण डरता जंगलों में।


देखती थी मुग्ध हरियल

पेड़ लहराते हुए।

स्वर्ण आभा प्रात की

औ साँझ गहराते हुए।


क्या हँसी मोहक नज़ारा

था उभरता जंगलों में।


अब कहाँ प्यारे परिंदे

वनचरों का कारवाँ।  

निर्दयी हाथों ने जिनका

रौंद डाला आशियाँ।


खौफ ही बेखौफ होकर

अब विचरता जंगलों में। 


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