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Dr Lalit Upadhyaya

Tragedy

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Dr Lalit Upadhyaya

Tragedy

जल,जमीन और जंगल

जल,जमीन और जंगल

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जल,जमीन और जंगल,  

करते प्रकृति का मंगल।   

 खुले में न रहें मल,

 रोगमुक्ति की ओर होगा कल।। 

 भूल आप जो कर रहे हो, 

 जल,जंगल,जमीन को छेड़ रहे हो। 

 आज तो बीत गया, 

  लेकिन कल को किस पर छोड़ रहे हो।

जंगल में की हमने कटाई,          

देखो गर्मी ने आग लगाई।         

कान खोलकर सुन लो भाई,       

प्रकृति फिर नहीं करेगी सुनवाई।।

आबोहवा को दूषित किया,       

कोरोना ने जब कष्ट दिया।          

अब घर में रहकर दे रहे दुहाई,      

संसार में कैसी वायरस से आफत आई।।

अभी नहीं तो कभी नहीं,           

यह फरमान आ गया है।

जल,प्रकृति,पर्यावरण को छेड़ने वालों,

दुनियां में मौत का साया छा गया है।।


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