जख्म तो बहुत हैं
जख्म तो बहुत हैं
जख्म तो बहुत हैं दिल पे मेरे अभी,
जानें वो कब इस दर्द से रु ब रु होंगे।
कहते तो हैं वो दिल में रहते हैं अब भी,
जानें कब वो पहचान में हमारी भी होंगे।
गुज़र गया एक अरसा इंतजार में उनके,
इन ख़ामोश लफ्जों के बयान कब होंगे।
तू ही नहीं अकेले इस दर्द के पहलू में,
इंतजार के पल जानें खत्म कब होंगे।
कैसे कह दूं , मुझे अब इंतजार नहीं तेरा,
खामोशियों के दौर अब कब खत्म होंगे।
सो जाती है चांदनी खामोश तेरी पलकों में,
तन्हा रातों के दौर अभी और कितने होंगे।
दिन को नहीं शिकायत तेरी आरज़ुओं से अब,
तेरी जुश्त जू के देने और कितने इम्तिहान होंगे।
यूं न मुकम्मल होगी तेरी वफ़ा की कहानी,
ग़ज़लों के जाने कितने दीवान लिखने होंगे।
तू कह तो एक बार, तुझे भी इंतजार है मेरा,
क्या सच्चाई के सबूत पैमानों में उतारने होंगे।
रह जाने दे ये दूरियां अब इतनी तो बाकी,
न जाने कितने इस तड़प से अनजाने होंगे।
अभी तो बाकी है शाम का उजाला थोड़ा और,
अंधेरों में उजागर जानें कितने राज़ पुराने होंगे।
यूं तो उम्मीद न थी मुझे तुझसे मिलने की पर,
यूं जी लिए कि मुलाकात के कुछ तो बहाने होंगे।

