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Amit Tiwari

Tragedy

4  

Amit Tiwari

Tragedy

जिस्म, मांस का टुकड़ा

जिस्म, मांस का टुकड़ा

2 mins
469


पास से गुजरते हो नोच लेते हो मेरे जिस्म का एक हिस्सा

अपनी आँखों से

पता चलता है मुझे हर बार

पर कहती नहीं कुछ नजरअंदाज करके निकल जाती हूँ आगे

क्योंकि चलाना होता है घर 

कमाना होता है मुझे भी तभी पाते हम खाना पेट भर

घर में जो मेरा बाप है वो अब बहुत कमजोर हो गया है

पूरी ज़िंदगी वो मिट्टी खोद कर जिया है

और मेरी माँ को दुनिया का बहुत कुछ पता नहीं

जाती है हफ्ते में एक दो बार किसी के घर करने कुछ काम

पर कमाती कितना पता नहीं

बस शाम को आती जब कभी खुश कभी उदास

जिस दिन मिला पकवान और मिठाई उसके चेहरे पर खुशी आई 

उस खाने को खुद कितना खाया पता नहीं 

लेकिन हमारे लिए गठरी बाँध कर ले आयी

जिस दिन मिला सूखा आनाज उस दिन सूखी रहती उसकी हँसी 

लेकिन लौटकर काम से उसे आता देख हमें मिलती है खुशी

भाई को कोई काम नहीं है कभी कभी आता है उसे कोई बुलाने

तब पता लगता है मुझे कि भाई भी जाता है कभी कभी कमाने

हाँलाकि अभी उसकी उम्र पढ़ने की है लेकिन खेत में किसी का दाना छींटना,

पानी देना या खाद डालना इतना ही होता होगा काम

शाम को कुछ पैसे कुछ मिल जाता और इनाम

हम सब मिलकर कमाते हैं तब जाकर खाने भर का घर चलाते हैं


लेकिन उस दिन जब तुम सबने मिलकर मुझे दबोचा

मेरे जिस्म को एक एक करके नोचा

नोच ली गयी सारी मर्यादा, नोचा गया मेरा अभिमान

पर बख़्श देते यदि प्राण तो फिर से उठ खड़ी होती

कुछ और अपने घर के लिए कमाती

लेकिन वो भी तुम्हें मंजूर ना था

जुबान काटी , रीढ़ की हड्डियों को तोड़ा था

फिर फि लड़ी मैं कुछ दिन तक यमराज से 

लेकिन हार गई इस कायर समाज से

मेरे साथ क्या क्या बीता यह कैसे तुम्हें बताऊँ

बलात्कार की क्या परिभाषा कैसे किसी को समझाऊँ

मांस से लेकर हड्डी तक कुछ न तुमने छोड़ा 

शासन प्रशासन सबने मिलकर मारा कलेजे पर हथौड़ा

राजनीति के धुरंधर, जन प्रतिनिधि जितने हैं

रोटी सेक रहे अपनी सब जलती मेरी चिता पर

आखिरी क्षण भी नसीब न हो सका मेरे घरवालों को 

कि देखे मुझको रो लें खुलकर, महसूस करें कुछ और दर्द मेरे मरे शरीर से

जाने कितनी मेरी जैसी अभी यातना झेल रहीं

क़ातिल और कमजोर समाज के खेल का हिस्सा बन रहीं!



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