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डॉ. रंजना वर्मा

Abstract

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डॉ. रंजना वर्मा

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ज़िंदगी

ज़िंदगी

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जिंदगी फिर जियें आन से मान से।

प्यार कर लें प्रकृति के उपादान से।।


नील नभ में सजी अंजुमन चूमकर ,

हर कली चूमकर हर सुमन चूमकर।

भोर की  तारिका  को  निहारा करें ,

हम बिखरती हुई हर किरन चूमकर।


पंछियों के  बिखरते  हुए  गान से।

प्यार कर लें प्रकृति के उपादान से।।


उठ रही हर  नदी की लहर चूम लें ,

वो अगर है ग़ज़ल हम बहर चूम लें।

रात काली बहुत है मगर क्या हुआ -

इसके पीछे छिपी जो  सहर चूम लें।


शिशु अधर पर खिली मुग्ध मुस्कान से 

प्यार  कर  लें प्रकृति  के उपादान  से।।


उग रही पौध को हम उखाड़ें नहीं ,

जिंदगी की लगन को उजाड़ें नहीं।

देह तन से  लिपटती  हुई धूल को -

बन सदय प्यार दें व्यर्थ झाड़ें नहीं।


नित्य उपभोग हो भाव का दान से।

प्यार कर लें प्रकृति के उपादान से।।


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