STORYMIRROR

Vijay Kumar parashar "साखी"

Tragedy

4  

Vijay Kumar parashar "साखी"

Tragedy

जिंदगी तुझसे

जिंदगी तुझसे

1 min
220

थक गया हूँ जिंदगी तुझसे

रुक गया हूँ जिंदगी तुझसे


अब न हंसता हूँ,न रोता हूँ,

टूट गया हूँ जिंदगी तुझसे


ख़्वाब तो पहले भी न थे,

जवाब तो पहले भी न थे,


प्रश्न से पहेली बन गया हूँ,

जिंदगी की घड़ी तुझसे


छूट गया हूँ जिंदगी तुझसे

रूठ गया हूँ जिंदगी तुझसे


फिर भी न हंसुगा,न रोऊंगा,

औऱ जिंदगी तुझे न ढोउँगा,


बनकर शूलों में गुलाब फूल,

खिल रहा हूँ,जिंदगी तुझसे


देखकर तेरे सब रिश्ते नाते,

जीना शुरू कर रहा हूं,फिर से


जिसमे होगा सिर्फ भाईचारा,

किसी बात का न होगा बंटवारा,


अब बना रहा हूँ,जिंदगी तुझे पत्थर,

ताकि तू न चुभोये मुझे कोई नश्तर,


बन रहा हूँ,शोले में शबनम हंस के

धरा से फलक बन रहा हूँ फिर से


किसी रिश्ते से विचलित न हो,

ऐसा चंदन बन रहा हूँ फिर से


जख़्म हो तो भी में हंस सकूँ,

दे ऐसा कलाम तू मुझे फिर से।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy