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Vijay Kumar parashar "साखी"

Tragedy

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Vijay Kumar parashar "साखी"

Tragedy

जिंदगी तुझसे

जिंदगी तुझसे

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थक गया हूँ जिंदगी तुझसे

रुक गया हूँ जिंदगी तुझसे


अब न हंसता हूँ,न रोता हूँ,

टूट गया हूँ जिंदगी तुझसे


ख़्वाब तो पहले भी न थे,

जवाब तो पहले भी न थे,


प्रश्न से पहेली बन गया हूँ,

जिंदगी की घड़ी तुझसे


छूट गया हूँ जिंदगी तुझसे

रूठ गया हूँ जिंदगी तुझसे


फिर भी न हंसुगा,न रोऊंगा,

औऱ जिंदगी तुझे न ढोउँगा,


बनकर शूलों में गुलाब फूल,

खिल रहा हूँ,जिंदगी तुझसे


देखकर तेरे सब रिश्ते नाते,

जीना शुरू कर रहा हूं,फिर से


जिसमे होगा सिर्फ भाईचारा,

किसी बात का न होगा बंटवारा,


अब बना रहा हूँ,जिंदगी तुझे पत्थर,

ताकि तू न चुभोये मुझे कोई नश्तर,


बन रहा हूँ,शोले में शबनम हंस के

धरा से फलक बन रहा हूँ फिर से


किसी रिश्ते से विचलित न हो,

ऐसा चंदन बन रहा हूँ फिर से


जख़्म हो तो भी में हंस सकूँ,

दे ऐसा कलाम तू मुझे फिर से।


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