जिन्दगी की तड़प
जिन्दगी की तड़प
जिन्दगी की तड़प
जिन्दगी ने अब, बहुत सी फुरसत से,
दी है मौत को आवाज।
की अब और न तड़पा मुझे,मिलन के विरह से,
बस अब ले चल मुझे तू अपने साथ,
अपने नगर को.
अब मुनकीन नहीं है, दर्द सहना जुदाई का,
ले चल मुझे तू अपने साथ ।
कि सांसों ने अब साथ चलना छोड़ दिया है ,
दिल ने अब धड़कना छोड़ दिया है ,
भरोसा रहा नहीं अब इस तन पे,
बस ले चल मुझे तू अपने साथ ,
अपने शहर को ।
अब और नहीं सुनना मुझे बहाना कोई,
थक चुकी हूँ मैं चलते-चलते, तेरे पीछे
लहू भी अब मेरा जमने को है,
साँसे भी अब रुकने को है ,
बस ले चल मुझे तू अपने साथ ,
अपने नगर को ।
बस ओर नहीं, अब और नहीं
मुमकीन है दर्द सहना तन्हाई का
सुन ले अब ,यह है गुजारिश मेरी,
की अब और न तड़पा मुझे,मिलन के विरह से
बस ले चल मुझे तू , बांहों में भर,
अपने साथ, ले चल मुझे तू अपने साथ
अपने शहर को ,अपने नगर को ।
ले चल मुझे तू अपने साथ

