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Prachi Beeka

Fantasy

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Prachi Beeka

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जीवन एक राख

जीवन एक राख

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 आज चंद्रशेखर घाट पर घंटों जलती चिताओं से बातें की,

पूछा - "कैसे हो? कैसा रहा यह जीवन की यात्रा जी?"

कुछ बचा है क्या तुम्हारे हाथ,

जा रहा है कोई तुम्हारे साथ।


लगता है, क्या कोई करेगा तुम्हारी बात?

कौन-कौन रखेगा तुम्हें याद?

अब धरती से मिल गई है अब तो मुखी,

यहीं छोड़ कर जा रहे हो साधना भक्ति।


पूरी ज़िंदगी निभाया फ़र्ज़,

आज आग के लैपटॉप में, तन्हा छोड़ गया दर्द।

क्या महसूस कर पा रहे हो अब?

मुझे सुन रहे हो क्या अब?


कुछ पलों में मिट्टी बन जाओगे,

एक अनजान सी चिट्ठी बन जाओगे।

अच्छा, जाने से पहले बोलोगे क्या?

यहाँ से आगे क्या करूँ, समझाओगे क्या?


तुम्हें इस तरह देख कर इच्छा दब सी गई,

मिट्टी होने की प्यास लग सी गई है।


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