जीवन एक प्रदर्शन था
जीवन एक प्रदर्शन था
उसकी आंखें जुगनू थी यह सोचा करता था,
इस प्रीत नगर में आकर दिल लगा बैठा था,
अपनी सुध -बुध खो सब कुछ लुटा बैठा था,
प्रेम के उस सपनों को पूरा करने की आस में,
आशा के व ख्वाबों के बाग लगाया करता था!
उसकी आंखों में इस तरह खोया में उम्र भर ,
उसका दीवाना होकर अपने होश गंवा बैठा था ,
मेरे जीवन की गाड़ी तो तुम संग ही चलती थी,
नासमझ था मैं तो तुम संग यूं प्रीत लगा बैठा था,
छूटा फूलों का दामन अब कांटों से नेह लगाना था !
क्यों तुम तो छोड़ चले थे राह में हमें अकेला यूं ही,
हम अपनी राहों को छोड़ तुम्हारी राहों पर आ बैठे थे,
औरों उसे क्या गिला करें हम खुद को सजा दे बैठे थे,
मेरे सभी अरमान दिल के दिलों में रह गए थे अधूरे,
हम दिल का सौदा हारकर जग से रीत निभा बैठे थे!
क्यों तुमने हमें बुलाया था क्यों यह प्रीत लगाई थी,
अब दिल बहलाना नहीं आता हमको झूठी बातों से,
समझ गए हैं यह दुनियादारी और यह समझदारी,
जिस सुंदरता को देखकर मेरा मन यू पागल सा था,
अब लगता है जीवन तो एक विधान प्रदर्शन था!
