जहां-ए-इश्क़
जहां-ए-इश्क़
चलो इस जहां के पार चलें.....।
जिससे हसीन कोई जहां ना हो।।
जहां गुलों को कांटे चुभते ना हो।
ज़मीं को तरसता आसमां ना हो।।
रोशनी को भी प्यार ज़िन्दगी से हो।
परवानों को जलाती शम्मां ना हो।।
इश्क़ उड़ता हो जहां बादलों की तरह।
हवाओं में ज़रा भी गुमां ना हो......।।
एक ही जात बस प्रेम की हो वहां......।
मोल मज़हब का मोहब्बत से बड़ा ना हो।।

