जहां डूब कर मर जाएं
जहां डूब कर मर जाएं
हे गुरुदेव!
मुझे भी ऐसी दिल-दरिया दिखा दें।
जहां महापुरुषों ने डुबाई अपने विकार।
कंचन बनकर फिर किया,
जग को रौशन, बता दें !
कैसे प्रभु श्री राम-कृष्ण ने,
विसर्जन किया अपना क्रोध।
कैसे बुद्ध ने डुबाए, अपने माया मोह ।
जहां आपकी डूबी है, इंद्रियों के विकार।
हे गुरुदेव !
मुझे भी ऐसी ही दिल-दरिया दिखा दें!
मैं भी डूबा दूं, अपनी सारी इच्छाओं को,
बन जाऊं, सही मायने में ,
अपने परम पिता का ही अंश।
हे महान गुरूदेव संदीपनी !
बना दे मुझे भी कृष्ण सा,
दुखी न करने दूंगा, चाहे ,
आए कितने भी अब कंस।
मैं पूरी तरह लालायित हूं,
आपके मार्ग चलना चाहता हूं।
मुझे आप पर ही है, भरोसा,
सारी दुनिया को ,खुद में ही समझता हूं।
आपकी ही आस है, दें मुझे भी मार्गदर्शन।
मेरे भी डूब कर मर जाए, सारे विकार।
हे गुरुदेव ! मुझे ऐसी दिल-दरिया दिखा दें।
जहां डूबकर मर जाएं मेरे सारे विकार।
एक को मारता हूं ,आ जाते हैं चार,
मालूम यह रक्तबीज हों, हो नहीं विकार।
हर पल सताते हैं, चैन से जीने नहीं देते,
यदि एक को देख लूं सीधी नजर ,
तो दूसरे चार हो जाते हैं तैयार।
अब तो आप ही बचाएं, रक्षा करें,
शक्ति दे इतनी, कर दूं इनका संहार।
