जायकेदार
जायकेदार
न रस था, न कोई रोमांच
और न ही रंगों की फुहार
तुम्हारे पदाक्षेप ने बना दिया
मेरे फीके जीवन को जायकेदार।
दालचीनी से भी मीठी हो तुम
केसर से ज्यादा लज़्ज़तदार
भोथर हो गयी थी आरी मेरे मंसूबों की
कर दिया तुमने उसे धारदार।
मेरी फीकी दाल सी ज़िन्दगी में
जीरे की मस्त छौंक हो तुम
दबी थी जो तहों में दिल के
वो सुषुप्त शौक हो तुम।
तुम ही तो हो पूर्णता
मेरे अतृप्त अरमानों की
तुम ही अमृतधार, बुझती है जिससे
अबूझ तृष्णा मेरे अंतर्मन की।
बाहर अंधकार का साम्राज्य
भीतर कालिमा का पारावार
आयीं तुम बन कर उजाला
करने को रोशन मेरा सारा संसार।
नीरस हो चला था समां
और रंगहीन सारा जहान
झांक कर चुपके से तेरे प्रेम ने
भर दिए उमंग से मेरे प्राण ।

