STORYMIRROR

AKANKSHA SHRIVASTAVA

Tragedy

3  

AKANKSHA SHRIVASTAVA

Tragedy

इन अंधेरो में कहीं मर ही ना जाऊँ

इन अंधेरो में कहीं मर ही ना जाऊँ

1 min
328


छोड़ के चल दिए यूँ हाथ मेरा जैसे के मैं एकदम ठीक हूँ 

पीछे मुड़ के एक बार तो पूछा होता बेटा क्या तुम ठीक हो 

तनहा हूँ इन अंधेरो मे कब से कहीं अब मर ही ना जाऊँँ 


लड़ते लड़ते थक चुकी हूँ , चुप रहते रहते धैर्य खो चुकी हूँ 

ख्याल बस इतना है की मेरी झूठी मुस्कान से तुम्हारे घर सुकून रहेगा 

जीना बस इसलिय मेरी सांसो से तुम्हारी सांसे चलेगी,सांस तो है मगर 

अँधेरा इतना है की कहीं मर ही ना जाऊँ।


चिंता मत करना मै कभी वापिस नहीं आउंगी 

इन अंधेरो मे ही जगह बनाउंगी 

अंधेरो मे ही रह जाउंगी 

हाँ बस घुटन का कोई इलाज नहीं है 

क्या पता अंधेरो की घुटन मे कहीं मर ही ना जाऊँ। 


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy