STORYMIRROR

AKANKSHA SHRIVASTAVA

Abstract

3  

AKANKSHA SHRIVASTAVA

Abstract

दर्द के पहलु से

दर्द के पहलु से

1 min
271

मेरी भटकती रूह को आराम मिल जाए 

काश हमपे भी दिल तोड़ने का इलज़ाम लग जाए। 


हर वक़्त टूटे दिल के साथ रहते हैं 

'ज़ुल्मी' हो तुम, हम पे भी ये इलज़ाम लग जाए। 


जस्बा और जस्बात का अंतर समझ आ जाए 

ज़िन्दगी में एक बार किसी के बर्बादी का इलज़ाम लग जाए। 


ठोकर तो बहुत खाई है दुनिया की हमने 

ठोकर देने वाले की दुनिया का भी नुक़्ता-इ-नज़र आम हो जाए। 


काश हम पे भी दिल तोड़ने का इल्ज़ाम लग जाए।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract