इल्तिजा
इल्तिजा
दिल में रखी जो बात उसे बोल लीजिए
मोहब्बत-ए-हसीं द्वार, खोल लीजिए
अरमां क्या है आपका ये जानेंगे कैसे हम
बस एक बार हमें, मोहब्बत से देख लीजिए
सुगंध-ए-दीवानगी फैली है हर तरफ़
गुल का पता हमें भी, ज़रा बता दीजिए
माना कि सुर्ख़ गुलाब मोहब्बत की शान है
वफ़ा के जहान में, रुख़ मोड़ लीजिए
किया बहुत इंतज़ार आपका अंजुमन में यहां
कब से ख़ामोश हैं लब, मुस्कुरा लीजिए
यारों ने बांधा समां यहां कोई गैर नहीं
फ़ुर्सत से दीदार-ए-यार, कर लीजिए
इल्तिजा है दिल की जनाब ज़रा गौर फरमाइए
बन के रहनुमा आप, हमें पहचान लीजिए।
(हसीं - खूबसूरत, अरमां - इच्छा, गुल - फूल, सुर्ख़ - लाल, वफ़ा -निष्ठा (सच्चाई), जहान - दुनिया, रुख़ - दिशा अंजुमन - सभा, लब - होंठ, दीदार - दर्शन, इल्तिजा - निवेदन, रहनुमा - मार्गदर्शक)

