इब्तिसाम (खुशियां)
इब्तिसाम (खुशियां)
सहर की किरणों के साथ हर रोज इब्तिसाम लिखती हूं,
बेहद मशीय्यतो के बाद अपने ख्वाबों को परवाज़ देती हूं,
रात के अंधेरे में कमरे की चांदनी को खुदा की इनायत मानती हूं,
खुली आंखों से भी अपने ख्वाबों को आसमान में जो देखती हूं,
हर वक्त मैं अपने ही अल्फाजों का तलफ्फुज करती हूं,
इन पाकीजा लफ्जों को नज्मों में उतारने की
हर पल एक नाकाम सी कोशिश जो करती हूं...
एक दफा ख्वाब टूटने पर अपने आप में ही सिमट कर रह जाती हूं....
मैं मेरे ख्वाब अपने से ज्यादा अपनों के लिए मुकम्मल करना चाहती हूं...
अपनी हर जीत पर हर एक शख्स के चेहरे पर
इब्तिसाम जो लिखना चाहती हूं....
