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हरीश कंडवाल "मनखी "

Drama

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हरीश कंडवाल "मनखी "

Drama

हवा का झोखा

हवा का झोखा

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 .

हवा का एक झोखा

जो हिला सकता है

, पेड़ पौधा, धरती,

आलीशान भवन,

और मिट्टी का टीला।

हवा का झोखा,

जो बदल सकता है

पानी का रास्ता,

समुद्र की लहरों की रेखा।


हवा का झोखा,

जो बदल सकता है

बादलों से घिरा आकाश

जो ला सकता है बड़ा तूफान।


हवा का  झोखा

ले आता है पतझड़

फिर फूटती हैँ कोपल,

उदय होता हैँ ऋतुराज बसंत ।


हवा का एक झोखा

पलट देता हैँ डाली का भाग्य

बिखेर देता हैँ धरती पर पुष्प

बदल देता हैँ मौसम का मिजाज।


हवा का एक झोखा

सूर्य की तपन को कर देता है कम

पछुवा पवने देती हैँ, बदलने की संकेत

हवा से तब प्रकृति का बदल देता हैँ स्वरुप।


सुबह का हवा का झोखा देता हैँ ताजगी

दोपहर की हवा देती हैँ सुकून की आहट

शाम की हवा लाती हैँ अपने साथ धूल

रात की हवा देती हैँ मन को नया सूकून।


हवा का झोखा तोड़ देता हैँ सब कुछ

बस नहीं तोड़ पाता हैँ तों मानव का अहम

हवा का जोखा, नहीं तोड़ पाता हैँ कोई वहम

यहीं अहम और वहम कर देता है, सबका विनाश।


हरीश कंडवाल मनखी की कलम से।.



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