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Dinesh paliwal

Abstract Drama

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Dinesh paliwal

Abstract Drama

।। हुनर ।।

।। हुनर ।।

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जिस हुनर को मैं ले के संजीदा था,

उस हुनर पे मुझे लोग आंकते कम थे,

जो खुलती थी खिड़कियाँ, दिल के आंगन में,

उसमें न जाने क्यों लोग झांकते कम थे।।


यूं तो बेपरवाह रहा हूँ मैं उम्रभर,

जमाने की इस फुसफुसाहट से,

न जाने फिर क्यों उन दिनों शायद,

उनको लेकर बड़े बेसाख्ता से हम थे।।


उम्र गुजरी थी तमाम बस अपनी शर्तों पर,

न कभी वक़्त से थका न लिया दम था,

उठा हूँ थाम हर बार दामन मैं परेशानी का,

तूने दिया है सहारा ये बस तेरा भरम था।।



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