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Mamta Singh Devaa

Inspirational

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Mamta Singh Devaa

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हर बार मैं ही क्यों ?

हर बार मैं ही क्यों ?

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क्यों बार - बार हर बार 

मैं ही दूँ अग्नि परीक्षा ?

इसलिए की मैं प्रेम में पिघल जाती हूँ ?

अपना सर्वस्व समर्पित कर तुमको

रिश्तों की धारा में बह जाती हूँ ?


मेरे समर्पण का बहाव तुम झेल नही पाते हो

मेरी पवित्रता के तेज से तुम खेल नही पाते हो,

तुम जल ना जाओ मेरे तेज से

इस डर से अपना पौरूष दिखा

अपना मुझ पर हक़ जता

मेरी ही परीक्षा ले डालते हो ?


तुम क्यों नही देते अग्नि परीक्षा ?

क्योंकि विश्वास है तुमको खुद पर

कि तुम सच सह ना पाओगे

इस पवित्र अग्नि में तुरंत जल जाओगे,

खुद का डर मुझ पर थोपते हो

और हर बार सदियों से


अविश्वास की नयी पौध रोपते हो,

आओ इस नयी सदी में 

अपना झूठा विश्वास तोड़ो

अपनी बेवजह सोच का रूख मोड़ो,

मैं तो युगों - युगों से देती आई हूँ 


नितांत अकेले अग्नी परीक्षा

इस बार तुम भी उतरो मेरे साथ,

तुमने तो अकेले जाने दिया था मुझे अग्नि में

लेकिन तुम डरो मत

मैं साथ हूँ तुम्हारे 

अग्नि के बाहर भी और अंदर भी

पकड़ के तुम्हारा हाथ।


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