STORYMIRROR

Vivek Agarwal

Action

4  

Vivek Agarwal

Action

हलाहल पी चुके हैं हम

हलाहल पी चुके हैं हम

1 min
288

हलाहल पी चुके हैं हम कि अब तांडव की बारी है।

कि दुष्टों को क्षमा करने की इक सीमा हमारी है।


सनातन का जो शत्रु है समय रहते सुधर जाये,

अगर जागृत ये हो जाये तो हर दुश्मन पे भारी है।

 

कि अपने खून से इस देश को हमने सँवारा है,

चढ़ाई भेंट मस्तक की कभी इज़्ज़त न हारी है।


हमारी सभ्यता कहती जियो खुद और जीने दो,

समय की मांग आयी जब ख़ुमारी सब उतारी है।


सुनो चेतावनी 'अवि' की शराफ़त से रहो मिल के,

जटाधारी की काशी है न मेरी ना तुम्हारी है।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Action