STORYMIRROR

sunil saxena

Abstract

2  

sunil saxena

Abstract

हिम्मत

हिम्मत

1 min
77

थी हमेशा हिम्मत डंडा खाने की , सिर तोड़वाने की , और उफ़ ना करने की

ना थी कभी मंशा डंडा उठाने की और हिंसा करने की

आज भी है हिम्मत डंडा खाने की और उफ़ ना करने की

पर आज जो डंडा मारेगा , उसे पलट के डंडा मारने की भी है मंशा ,

और उसका सिर तोड़वाने की भी है मंशा

आज उसने कर दी है अहिंसा की झिझक दूर

बना दिया है उसने डंडा अपना गन्ना , और गन्ना छिल जाता है ,

चब जाता है , बन जाती है उसकी गनडैरी



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract