STORYMIRROR

Deepika Mishra

Abstract

3  

Deepika Mishra

Abstract

वजूद ज़िंदगी का

वजूद ज़िंदगी का

1 min
272

दर्द की इंतेहा आँखों की गहराइयों में है

कुछ सवाल छुपे हुए, अतीत की परछाइओं में है।


हर घाव हँसकर पूछता है, वजूद तेरे होने का ?

क्यों है डर हर कोने में, सब कुछ पाकर खोने का ?


जिंदगी भी अजीब है, हर बार एक नया बहाना ढूंढ लेती है।

सलाम है उस जज्बे को, जो सब कुछ भूलकर फिर नयी

मंज़िल तलाश कर लेती है।


लोग सोचते ही रह जाते हैं ऱाज तेरी हिम्मत का

और तू है कि फिर मुस्करा के आगे कदम बढ़ा लेती है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract