हैं रू-ब-रू फिर आज दोनों
हैं रू-ब-रू फिर आज दोनों
हैं रू-ब-रू फिर आज दोनों हम मगर ख़ामोश हैं।
है जश्न की ये रात लेकिन हम ज़रा ग़म-कोश हैं।
हैं सामने बैठे मगर क्यूँ अजनबी से तुम लगो,
वैसे तसव्वुर में हमारे रोज हम-आग़ोश हैं।
ये मयकदे किस काम के जो आपका दीदार हो,
बस इक नज़र जब भी पड़ी तो हम हुए मदहोश हैं।
तुमको मुबारक चाँद तारे हम अँधेरों में भले,
इस रौशनी का क्या करें जब हम यहाँ बेहोश हैं।
जो तुम कहो अंज़ाम अपना हर सजा मंज़ूर है,
बस याद रखना बात ये हम आज भी निर्दोष हैं।
तुम ख़ूब पहनो शौक से कपड़े नए हम ठीक हैं,
पहनें वही कपड़े पुराने हम कहाँ ख़ुश-पोश हैं।
ख़रगोश कछुए की कहानी हम सभी ने है सुनी,
पर असलियत में जीतते तो हर जगह ख़रगोश हैं।
ज़ालिम बड़ा ये वक़्त है सब छीन लेता है यहाँ,
जज़्बा हमारे दिल में था पर अब कहाँ पुर-जोश हैं।
जब बोलते थे रात दिन तब कोई सुनता था नहीं,
ये लब हमारे सिल गए जब सब हमा-तन-गोश हैं।

