हालात मेरे भी बदलेंगे...
हालात मेरे भी बदलेंगे...
फिर एक नया सवेरा होगा...
गर्दिश-ए-ज़िन्दगी मेरी
एक रोज़ खत्म ज़रूर होगी...!
मैं हरगिज़
अपनी हालात के आगे
रहम की भीख नहीं माँगूंगा !
आगे जो भी
किस्मत में लिखा होगा,
उसे मैं अपनी
खुद्दारी से सह ही लूँगा !
वैसे भी न जाने
कितने बेरहम मौसम में
मेरी किस्मत की कश्ती
डूबते-डूबते बची,
मगर मैंने जंग-ए-ज़िन्दगी से
पीठ दिखाकर
नहीं भागा...
और न ही आगे
किसी सूरत-ए-हाल में भागूँगा।
मैंने कई मरतबा
भाव विभोर होकर
या आवेश में आकर
(अपने लिए हानिकारक)
निर्णय लिया किए,
जिसकी भरपाई मैं
अब तक कर रहा हूँ...!
मगर अब आइंदा
वही सोच लेकर
आगे बढ़ूँगा,
जिससे मेरी किस्मत का दरवाज़ा
सही मायनों में खुल जाए...
और मुझे अपनी
मजबूरियों तले दब के
दुबारा
बदहाल ज़िन्दगी की
हालात पे न रोना पड़े !
बेशक़ हालात मेरे भी बदलेंगे... !
मैंने अपनी ज़िद के आगे
आसमां की भी
परवाह नहीं की... !
आज जो मैं ज़मीन पर हूँ,
कोई मलाल नहीं,
क्योंकि मुझे
अपनी औकात मालूम है...
ये वक्त की हेराफेरी है,
सबको मालूम है,
मगर आसमां चुप है...
इस चुप्पी के पीछे की
आंधी-तूफान और वज्रपात की
आवाज़, बशर्ते, कोई
सुन नहीं पा रहा होगा,
मगर
मैं हर हाल में
अपने सितारे
ज़मीन पर ही चमकाऊँगा... !!!
