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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Tragedy

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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Tragedy

ग्रामीण जीवन

ग्रामीण जीवन

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याद है वो गांव में गुजारा जमाना,

खेतों की सोंधी माटी का खजाना।

दही का बिलोना छोटा सा बकरी का छौना। 

पनघट में लिये गागर गोरी का लजाना।


माटी से नहाता पडोस का कल्लू कन्हैया,

खुश हो मां उसकी लेती कैसी बलइया।

शाम ढले कहानी से शुरू होती चौपाल,

गिल्ली डंडे के चौके छक्के से हाथ लाल।


कनकौआ उड़ाते बच्चे कटी पतंग लूटते।

कुल्लड़,दोनों की खुशबू आंगन में फूटते ।

चलती चक्की घर की,संगीत निराला था ।

गांव में ब्रह्म मुहूर्त का ही बोलबाला था


पशुपक्षीमानव तीनों का खूब समन्वय था ।

चूल्हे की रोटी आंगन का न बंटवारा था

गांव भी शहरी संस्कृति से रहे न अछूते,

ग्रामीण भी घड़े को भूल फ्रीज पानी पीते ।


इंटरनेट ने ज्यों-ज्यों अपने पैर पसारे,

कर पश्चिम का अनुकरण बाबू बने न्यारे।

पैदल चलना भूल गए जब से गाड़ी आई ,

श्रम महत्व किताबों में ही रह गया भाई


आज गांव बसा है केवल बूढ़ी आंखों में

क्या-क्या खो दिया विकास की छांव में

जब से घर पक्के कंक्रीट के हो गए हैं

परिवार की लहलहाती बेलें सूख रहीं है


खेत पड़े वीरान घर में गाय न रंभाती है

आ लौट के आ मेरे लाल मां बुलाती है 

हो सके तो एक बार फिर आबाद कर दो।

जीवन को कर रसासिक्त गंवइ रंग भर दो ।

      



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