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Vijay Kumar parashar "साखी"

Drama Tragedy Inspirational

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Vijay Kumar parashar "साखी"

Drama Tragedy Inspirational

"गलती स्वीकार"

"गलती स्वीकार"

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जो व्यक्ति खुद की गलती लेते है, स्वीकार

वो गिरकर भी बन जाते है, एकदिन गुलजार


वो मनुष्य इस धरा के बहुत ही बड़े है, भार

जो जानबूझकर करते है, गलतियां हजार


जिन्हें पर पीड़ा में मजा आता है, अपार

वो मनु रूप धरे जानवर रूपी है, विचार


जो अपनी कमियां वक्त रहते लेते, सुधार

उनके शनै:-शनै: मिट जाते है, सब विकार


एक दिन वो पत्थर बन जाते है, मोमदार

जिन पर कर्म रस्सी चलती है, धारदार


उनकी लौ से मिटने लगते है, अंधकार

जो छोड़ देते है, यहां पर अपना, अहंकार


पर कुछ लोग ऐसे भी करते है, व्यापार

खुद की गलती कभी न करते है, स्वीकार


ऐसे व्यक्ति में समाया, दरियाभर अहंकार

जिनकी दृष्टि में उनके सिवा सब है, बेकार


छोड़ दे, यहां ऐसे सब तू साखी, पारावार

जो विशाल है, पर न बुझाता प्यास यार


तू बनना, यहां बस ऐसी नदी का श्रृंगार

जो निरंतर बहती, मिटाती गंदगी बारंबार


जो व्यक्ति खुद की गलती लेते है, स्वीकार

वो गिरकर भी एकदिन बन जाते है, गुलजार


माना अपने भीतर कमियां छिपी, बेशुमार

पर करते रहने से बार-बार प्रयत्न, हजार


वो लोहा भी एक दिन बनता, स्वर्ण चमकदार

जो अपनी गलतियों का शून्य कर लेता, भार



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