गज़ल।
गज़ल।
याद उसकी दिन-रात मुझको सताती रही ।
मुख से कह ना सका, पर वह रुलाती रही।।
उसके राजी- रजा पर, मुसाफिर बन चलता रहा।
ठोकरें खाकर भी ,उसकी मुस्कुराहट दिल में समाती रही।।
वह मुझ पर तरस खाए न खाए, है उसकी खुशी।
मेरी चाहत का असर ,उस पर हमेशा छाती रही।।
यों तो वह मिलती रही, हर जगह पर मगर।
ना जाने फिर भी वह मुझसे, नजरें चुराती रहीं।।
उसकी यादें मेरे दिल को,हमेशा गुदगुदाती रहीं।
दर्द हँस- हँस के मुझको , हरदम रुलाती रही।।
मेरी आँखें उनके दीदार को,हरदम तरसती रहीं।
वो नज़र से, मेरे जिगर में समाती रही।
मुलाकात तो तुमसे एक ना एक दिन होकर रहेगी,
यह वादा है "नीरज" का, तुम भी मुझको चाहती रहीं।

