गजल(रूठना)
गजल(रूठना)
बात बात पर क्यों रूठ जाते हो,
अगर निभाना नहीं आता तो बातें क्यों बनाते हो।
उछाल कर बात को क्यों घबराते हो, अगर कटने का
डर है तो पतंगे क्यों उड़ाते हो।
कभी भी गिर कर बन जायें खंडर,
ऐसे ख्वाबों के पुल क्यों बनाते हो।
जमाने की नजरों में बचकर रह नहीं सकते
फिर झूठी कहानियों को क्यों छुपाते हो।
चोट लगाकर कहते हो, हंसता
भी रहे कोई जीवन भर फिर इतना कहर क्यों ढाते हो।
बड़े गहरे व नाजुक होते हैं यह दिल के रिश्ते सुदर्शन
सभी को सुनाकर हंसी के पात्र क्यों कहलाते हो।
जब भी जरूरत पड़ी खुद इंकार किया
फिर सब की आने की आस रखकर क्यों आजमाते हो।
