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ANIRUDH PRAKASH

Abstract

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ANIRUDH PRAKASH

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ग़ज़ल न. 30 ,,जुनूँ में इश्क़ के

ग़ज़ल न. 30 ,,जुनूँ में इश्क़ के

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अँधों के सामने आईना चमकाता है क्या 

क़स्दन जिन्हों ने की हों आँखे बंद उन्हें जगाता है क्या


जुनूँ में इश्क़ के आँगन में बिखरा दिए वफ़ा के दाने 

अब उस आँगन से ग़म के परिंदों को उड़ाता है क्या


जो गुलशन शादाब ना हुआ मौसम-ए-बहारा में भी

तू उसे ख़ौफ़-ए-ख़िज़ाँ से डराता है क्या


दिल को तस्ख़ीर कर लिया अपनी तिलिस्मी आँखों से

अब इस महकूम से नज़रें चुराता है क्या


दर्द के इंतिहा तक खिंच गयी जिस्म की हर एक रग 

आगाज़-ए-इश्क़ ये ही कहलाता है क्या


जो शहर जगमगाता हो बेशुमार झूठ के आफ़ताबों से

वहाँ मुसलसल सच का दिया जलाता है क्या


ज़िन्दगी अपनी तमाम गुज़री है मयखाने में 

नासेह तू मुझे ज़न्नत के ख़्वाब दिखाता है क्या


जिसको महारत हो लोगों को शीशे में उतारने की 

उसको तू आईना दिखाता है क्या


जब घर के अंदर की सब दीवारें बेरंग हों 

फिर देहलीज़ को रंगोली से सजाता है क्या


दश्त के दश्त जल के खाक़ हो जाते हैं एक चिंगारी से 

तू मेरे दिल में आरज़ुओं के शोले भड़काता है क्या


घर के सेहन और गली के बीच कभी दीवार खड़ी ना की तूने

समर-ओ-गुल की ख्वाइश में अब शजर की डालियाँ हिलाता है क्या।


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