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बेज़ुबानशायर 143

Abstract Fantasy Inspirational

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बेज़ुबानशायर 143

Abstract Fantasy Inspirational

गजल 1

गजल 1

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हमें बात कड़वी सुनाते रहे हो 

सताते रहे हो रूलाते रहे हो 


तुम्हारी तो अवकात कुछ भी नहीं थी 

हमें दोस्त अपना बनाते रहे हो 


अचानक ही तुमको ये क्या हो गया 

हमेशा नज़र तो मिलाते रहे हो 


मिलाते नहीं हाथ क्यों आप हमसे 

हमें दर्द अपना सुनाते रहे हो 


भला और इसके सिवा क्या किया है 

हमेशा ही काँटे चुभाते रहे हो 


सभी राज़ तेरे अयाँ होंगे इक दिन 

अभी तक जिन्हें तुम छुपाते रहे हो 


बदल जाएगा वक्त भी इक न इक दिन 

जो महफ़िल को अपनी सजाते रहे हो 


तुम्हें क्या पता ज़िन्दगी कैसे चलती 

हमेशा ही चमचा हिलाते रहे हो 


वो सुनता नहीं दास्ताँ ग़म की गौहर 

अभी तक जिसे तुम सुनाते रहे हो 




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