ग़ज़ल
ग़ज़ल
था कर्ज़ हम पे, उतार आए
वो फूल उन पे , जो वार आए
सदा न आई कोई पलट के
कई दफ़ा हम पुकार आए
न तुम पेसाया भी गुज़रे उसका
जो ज़िन्दगी हम गुज़ार आए
हमीं ने सींचा शजर गुलों का
हमारे हिस्से ही खार आए
कमी तुम्हारी रही हमेशा
खुशी के लमह़े हज़ार आए
यकीं का रिश्ता जो दरमियां है
दरार इस में न यार आए
खिजां की मुद्दत गुज़र चुकी है
हूँ मुन्तज़िर फिर बहार आए।
