ग़म
ग़म
नाज़ जिसपे किया वो शख्स ही बेदम निकला
साज़ बदले बहुत आवाज़ में बस ग़म निकला
वहम की धूप में बैठे थे सुखाने ग़म को
ताप खुशियों का ही अंदर से बहुत कम निकला
ताश के पत्तों सी संभाली ज़िन्दगी हमनें
ताश बिखरेंगे नहीं ये महज़ भरम निकला
सुख़न के पल की थी ख़्वाहिश हमारे हुज़रे में
आस का पहलू ही अश्कों से भींगा नम निकला
थी हज़ारों शिकायतें ज़मानें भर से हमें
देव करता भी क्या कायर तेरा सनम निकला।।
