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Sudershan kumar sharma

Tragedy

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Sudershan kumar sharma

Tragedy

घाव

घाव

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मत लगाओ शब्दों के तीर किसी को, घाव कर जांएगे, 

कहां से लाऐगा वो मरहम बेचारा जिससे वो भरे जांएगे। 


 ये तीर, 

दिल चीर कर पार कर जाते हैं

लेकिन कहने वाले को टुकड़े

कहां नजर आते हैं। 


बेचारा एकतरफा निभाता 

है प्रीत को ता उम्र, दूसरा चलाता है वाण इस कदर

कि कलेजा छलनी चीर होजाता है। 


सुनते नहीं दूसरे की एक भी

अपने ताने पे ताने कसे जाते हैं,

मत चला शब्दों के तीर  सीने में घाव कर जाते हैं। 



जब भी किया खुशी अपनी का जिक्र सुदर्शन तो ताने बेशुमार कसे जाते हैं,

खिंचाव इतना देते हैं कमान को

कि कलेजा छलनी कर जाते हैं, मत लगाओ शब्दों के तीर किसी को घाव कर जाते हैं। 


जब कभी गुंजाइश निकाली

अपने दिलो दर्द की आज नहीं

अब नहीं कह कर टाल दिया

कहना चाही अपने दिल की बात हर बात को काट दिया

कैसे समझाये उन्हें सुदर्शन की दोहरा कर याद आने से

शब्द झुंझला जाते हैं, 

मत लगाओ शब्दों के तीर किसी को घाव कर जाते हैं। 


जब सुनता नहीं कोई सुदर्शन

तुझसे फरियाद करता हूं, भर

दे जख्म खुदा मेरे जिन्हें सीने

में लिए चलता हूं, 

इन्सानियत खो दी इन्सान ने

जब दिल चाहा लहु से खंजर

भर दिए जाते हैं, 

मत लगाओ शब्दों के तीर किसी को घाव कर जाते हैं। 




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