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Janvi Choudhury

Tragedy Classics Inspirational

4  

Janvi Choudhury

Tragedy Classics Inspirational

गांव की औरत

गांव की औरत

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सुबह पाँच बजते ही मुर्गा चेहकती है,

तब उठकर आंगन और घर को झाड़ू करना,

गाय गोबर के उपले घर के दिवार पर लेप करना,

और ये सिर्फ़ एक गांव की औरत ही कर सकती है।


बात गांव की हो या सेहर के फ़रक तो है,

गाय को घास दिलाना, 

कुए से बाल्टी में पानी लाना,

और ये सिर्फ़ एक गांव की औरत ही कर सकती है।


खुद काम कर -करके पसीने से भीगना,

फिर भी घर को साफ करना, बर्तन तालाब पर लेके धोना,

और तालाब से घर तक मटकी बेह कर लाना,

और ये सिर्फ़ एक गांव की औरत ही कर सकती है।


नारी मशीन से कई ज़्यादा आगे है,

जंगल से लकड़ी काटके लाना,

चूल्हे पर फूँक कर खाँसते हुए भी उस पर सबके लिए प्रेम पूर्वक खाना बनाना,

और ये सिर्फ़ एक गांव की औरत ही कर सकती है।


जो देती है प्रेम पूर्वक देती है चाहे खाना हो या पानी,

माटी का कुठिया ही उसके लिए महल है, सीधी सरल गांव की है हर महिला,

नहीं करती है कभी बड़े घर की कामना,

और ये सिर्फ़ एक गांव की औरत ही कर सकती है।


चाहे कड़क धुप हो या हो तेज़ बारिश वह कभी नहीं रूकती है,

पगडंडी पर सर पर गागर रख कर चलना और पीछे न मुड़ना,

खेत -खलियारों में पौधों को खत देना,

और ये सिर्फ़ एक गांव की औरत ही कर सकती है।


दया की मूरत है, ग्राम वासी है इसलिए वह ग्रामदेवी है,

बहार कहीं जा नहीं पाती न ही खरीदने का कुछ शौक रखती है,

घूँघट में रहने वाली औरत है न आता है उन्हे हार मानना, न ही किसी पर चिलाना,

और ये सिर्फ़ एक गांव की औरत ही कर सकती है।


पनघट पर कपडे धोती है,

ज़रुरत पड़ने पर वह चटान भी बन जाएगी, नहीं आता है उसे रुकना,

नहीं आता है थक कर दो पल बैठ जाना,

और ये सिर्फ़ एक गांव की औरत ही कर सकती है।


न पता है उसको अपना जन्मदिन न मनाती है अपना कोई स्पेशल दिन,

फिर भी दिवाली के दिए के तरह आता है उसको मुस्कुराना,

परेशान कितनी भी क्यों न हो माथे पर हर शिकंज को आता है उसे छुपाना,

और ये सिर्फ़ एक गांव की औरत ही कर सकती है।


सभी का ख्याल रखती है एक गांव की औरत,

अकेले जाना कहीं उसका स्वाभाव नहीं है,

क्यों की वह जानती है एकत्रित होने, एक साथ आनंद से मिलकर रहना,

और ये सिर्फ़ एक गांव की औरत ही कर सकती है।


भले ही पहनावे महंगी इतनी न हो मगर सभ्यता उसकी साड़ी और घूँघट में ही है,

लंटर्न लिए अकेली चल देगी वह उसको किसी बात का डर नहीं है,

बड़ा आनंद है परिवार के संग बगीचे की ताज़ा-ताज़ा सब्जी को खाना,

और ये सिर्फ़ एक गांव की औरत ही कर सकती है।


संस्कारी और साँवली सूरत सी है, मुस्कान के पीछे दर्द कितना भी हो,

फिर भी दर्द काटके सबको खुशियों से बांधती है,

आँखों में लाज और माथे पर सबकी ज़िम्मेदारी लिए साथ चलती है,

और ये सिर्फ़ एक गांव की औरत ही कर सकती है।


सबको परोस अंत में खाती है,

चूल्हा पर बैठे आधा दिन उसका गुज़र जाता है, भगा -दौड़ी में पूरी उम्र काट देती है,

फिर भी आता नहीं उसे शिकायत करना,

और ये सिर्फ़ एक गांव की औरत ही कर सकती है।


बिजली न होने पर पानी लाना,

लंटर्न जलाए घर को पुरे घर को उजाला कर देना,

सरसों के खेत में पौधों को पानी देना उसकी भी सेवा करना,

और ये सिर्फ़ एक गांव की औरत ही कर सकती है।


पढ़ाई पूरी तो कर न सकी,

फिर भी बच्चों को बड़ा बनाना है, सपना है उनको आगे चलते देखना है,

और ये सिर्फ़ एक गांव की औरत ही कर सकती है।


कभी बच्चों से अटखेली है वह,

कभी शांत सी कमल है वह,

शीतल जैसी छाया देने वाली गांव की औरत है वह,

और ये सिर्फ़ एक गांव की औरत ही कर सकती है।


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