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Richa Baijal

Romance

4.0  

Richa Baijal

Romance

एक वक्त अपना -सा

एक वक्त अपना -सा

1 min
295


कभी-कभी कुछ सुकून से जी लेते हैं 

महफ़िल में उनकी शामिल हो लेते हैं 

अल्फ़ाज़ों की महक है शामिल,

जज़्बात भी वफ़ा के काबिल,

है मुमकिन-सा याराना अपना

बस, तेरी नज़रें कटती सी मालूम होती हैं 

जब भीड़ में शामिल तुम्हारी और भी दोस्त होती हैं 

मेरा शक करना मुमकिन -सा है 

तेरा बेपरवाह होना फितरत -सा है 

मुस्कानों के मिलने का सिलसिला अब कम -सा हुआ 

तू यार मेरा, अब कुछ दूर इस कदर हुआ 

काश ! वफाओं का पैमाना होता 

मुमकिन आपके साथ इक ज़माना होता 

कांच-सा था भरोसा अपना, पल भर में बिखर गया 

था बहुत खूबसूरत और रंगीन बहुत, 

इक पल में छलक गया -

उनका मेरे पास आना, आकर चले जाना

यूँ लगा कि इक ज़माना पल भर में गुज़र गया

 


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