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आकिब जावेद

Romance


5.0  

आकिब जावेद

Romance


लिखा करता

लिखा करता

1 min 179 1 min 179

चिट्ठी में कोई अपने एहसास लिखा करता

मुझ को धरती और खुद को आकाश लिखा करता


झांझर नदियों की बजती हर प्यास बहक जाती

सागर की हर लहरों का निःश्वास लिखा करता।


हर शब्द प्रेम में रंगा हुआ हर पंक्ति गीत होती

हर रात पूर्णिमा होती फिर मधुमास लिखा होता।


मौसम का बेदर्द डाकिया मेरे घर फिर आता

उसके ख़त में फिर मुझको विश्वास लिखा होता।


डगमग कदम संभाले "आकिब" रहता आगे को 

मंज़िल की सीढ़ी पर जो शाबास लिखा होता।



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