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Sahil Hindustaani

Romance

4  

Sahil Hindustaani

Romance

एक शक़्ल पे...

एक शक़्ल पे...

1 min
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एक शक्ल पे ग़ज़लें हज़ार

प्यार हुआ है पहली बार

आँखें उसकी कर रही मदहोश

कोई संभालो मुझको यार

लब़ उसके बना रहे शराबी

उनके लम्स* को हूँ बेक़रार


* लम्स - स्पर्श

पायल उसकी छन - छन करती

कर रही दिल ज़ार - ज़ार

ए से आई है वो पास

दिल कर गई तार - तार

गाल उसके जैसे मख़मल


सब्र मेरा तोड़ते हर बार

मुस्कान उसकी उड़ाती होश

कैसे सहूँ मैं उसके वार

औरों से बातों में मश्गूल

कोई बता दो कहाँ चरागार*


*चरागार - Doctor

चाँदनी भी अब लगती फ़ीकी

उसकी बिंदिया का एसा वार

उसकी ही करता हूँ इबादत

ज़र्रे - ज़र्रे में उसका दीदार।


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