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Akhtar Ali Shah

Romance

3  

Akhtar Ali Shah

Romance

एक परी

एक परी

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निकले हैं पंख कल्पना के,

मैं उड़ता दूर गगन में हूं ।

एक परी उतर कर नज़रों में,

दिल मेरा रोज़ चुराती है ।।


इन दिनों समंदर में गहरे,

इच्छाएं गोते खाती हैं ।

लाती हैं मोती माणक चुन ,

धनवान बनी इठलाती हैं ।।

मैं लिपटा सजधज में रहता ,

दरबारे शाही में नृप सा । 

और खड़ी बगल में प्यारी सी ,

एक दासी चंवर ढुलाती है ।।

निकले हैं पंख कल्पना के ,

मैं उड़ता दूर गगन में हूं।

एक परी उतर कर नज़रों में ,

दिल मेरा रोज़ चुराती है ।।


जब झूला बनकर आरज़ुएँ

बाहों में मुझे झुलाती हैं।

अभिलाषाएं तब रगरग में ,

मुझको भी साथ बहाती है।। 

मैं सुधबुध खोया सा अचेत,

सुख के बिस्तर पर होता हूँ ।

ख्वाबों में कभी टहलता हूँ ,

और कभी नींद लग जाती है।। 

निकले हैं पंख कल्पना के ,

मैं उड़ता दूर गगन में हूँ ।

एक परी उतर कर नज़रों में ,

दिल मेरा रोज़ चुराती है ।।


उठता है ज्वार समुंदर में ,

मन का तट तोड़ निकलता है।

कोमल कलिका का चंचलपन ,

जब रंग "अनन्त"बदलता है ।।

हो जाती क्रूर तमन्नाएं ,

जख़्मी दिल को कर देती है ।

कुवारेपन की गंगा मेरी ,

मुंह मेरा बहुत चिढाती है ।।

निकले हैं पंख कल्पना के,

मैं उड़ता दूर गगन में हूं ।

एक परी उतर कर नज़रों में,

दिल मेरा रोज़ चुराती है ।।



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