एक मनभावनी सी कविता
एक मनभावनी सी कविता
एक मनभावनी सी कविता
सोचती हूँ
आज एक मनभावनी
सुंदर सी कविता लिखूँ
पर सामने आ जाता है
वह छोटा बच्चा
पक्का रंग
अधनंगा
बहती नाक
गालों पर बहे आँसुओं की
पप्पड़ पड़ी सूखी लकीरें
भूख को झुठलाता
अँगूठा मुँह में
इधर उधर
शायद कुछ खोज रहा
हो सकता
एक रोटी या फिर
खोयी अपनी माँ
कुछ भी हो मेरी
कविता में यह बच्चा
फिट नहीं बैठता
फिर खोजा
नयी विषय वस्तु
कविता के लिये
निगाह पड़ी सामने
भूखे गुर्राते कुत्तों पर
एक फेंकी गई
पत्तल पर
कुछ जूठन चिपका था
दोनो लड़ रहे थे
झपट रहे थे
तभी उठा ले गया
दूसरा कुत्ता
थोड़ा झबरीला जबर सा
अब दोनो कुत्तों की
हाँफ निकल रही थी
थोड़ी टपकती लार के साथ
यह भी
मेरी सुंदर कविता की
विषय वस्तु नहीं
फिर पीछे देखा
कुछ नया मिल जाये तो
गुदड़ी में लिपटी
एक बच्ची सामने मेरे आ कर
अचानक लुढ़क गयी
हिम्मत नहीं कर पायी
देखने की कि
वह जिंदा है या
मुर्दा हो गयी
भूख से या ठंड से
मानती हूँ कि
नहीं खोज पायी
कोई अच्छी सी
सुंदर विषय वस्तु
मेरी सुंदर कविता के लिये
