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SHREYA PANDEY .

Romance

4  

SHREYA PANDEY .

Romance

एक कल्पना तेरी

एक कल्पना तेरी

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सांझ में डूबता हुए सूरज

जब छाप छोड़ अपना नभ पर

प्रकाशित हो उठता है अम्बर

उस श्वेत बादल पर बुनती हूं

एक कल्पना तेरी


आम के पेड़ की डाली पर बैठी

एक कोकिला मधुर बेला में

पुकारे अपने खोए साथी को

कहा छिपे हो अकेला हूं मैं

उस डाली पर उभरती है

एक कल्पना तेरी


नहरों की लहरों पर अटकी

एक चींटी बेगानी सी

देख एक टुकड़ा तिनके का

हो उठे अजब दीवानी सी

उस तिनके पर बुनती हूं 

एक कल्पना तेरी


शरद की ठंडी पुरवाई

जमादे जो पूरी गुफा को

सिकुड़ कर बैठे एक दूजे को गले लगाए

दो मृग छिपाए एक दूजे में अपनी वफा को

उस पुरवाई में उभरती है

एक कल्पना तेरी


बारिश की बूंदे जो बैठे सिमटकर

बादल के दिल और जान में

मिले धारा से बिछड़े मेघा

ओस बने मेघा के अश्रु 

उसी धरा के निकट पर

ओस से सने पात पर उभारुं

एक कल्पना तेरी।।



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