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Saroj Garg

Abstract

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Saroj Garg

Abstract

एक दिया

एक दिया

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प्रभात बेला में  हाइकू

मन अंगड़ाई ले

प्रसन्न तन


रात की चादर  

तारे ओढ़कर 

मुस्कुराते 

 

मधुर रागिनी 

हवाओं ने गाई

फिज़ाये मुस्कुराई।

मयूरा मन 

नाच उठा तन

प्रसन्न हो कर।


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