एक बेटी का दर्द
एक बेटी का दर्द
पाला है नाज़ों से तुमने मुझको
मेरी हर ख्वाइश को पूरा किया है
कहते हो मुझसे घर की रोनक हूं मैं
तो क्यूँ खुद से दूर कर रहे हो मुझको
जिस घर को हमेशा अपना माना मैंने
क्यों उस घर को मेरे लिए पराया करते हो तुम
जिन चीजों पर अपना हक जताती थी मैं
आज वो सब मेरे लिए पराई हो रही हैं
जिसे माना मैंने अपना ही हर पल
वो चीज़े तो अब मेरी न रही
किसी और के पास भेज कर कहते हो खुश रहना
पर रह पाऊँगी कैसे,क्या ये सोचा तुमने ?
हमेशा रहे तुम साथ एक साए की तरह
अब तुम्हारे बिना मैं रह पाऊँगी कैसे
न भेजो इतना दूर मुझे तुम
मैं उनको अपना दर्द बताऊंगी कैसे ?
और उनपर अपना हक जताऊंगी कैसे ?
