STORYMIRROR

Salil Saroj

Drama

1.7  

Salil Saroj

Drama

दो ग़ज़ ज़मीन है बहुत

दो ग़ज़ ज़मीन है बहुत

1 min
485


इस कागज़ी बदन को यकीन है बहुत

दफ्न होने को दो ग़ज़ ज़मीन है बहुत।


तुम इंसान हो, तुम चल दोगे यहाँ से

पर लाशों पर रहने वाले मकीं हैं बहुत।


भरोसा तोड़ना कोई कानूनन जुर्म नहीं

इंसानियत कहती है ये संगीन है बहुत।


झुग्गी-झोपड़ियों के पैबन्द हैं बहुत लेकिन

रईसों की दिल्ली अब भी रंगीन है बहुत।


वो बरगद बूढ़ा था, किसी के काम का नहीं

पर उसके गिरने से गाँव ग़मगीन है बहुत।


बस एक हमें ही खबर नहीं होती है

वरना ये देश विकास में लीन है बहुत।


*मकीं- मकाँ में रहने वाला



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Drama