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Salil Saroj

Romance Classics Crime


4.0  

Salil Saroj

Romance Classics Crime


यूँ ही कातिल के हाथ में खंज़र नहीं आता

यूँ ही कातिल के हाथ में खंज़र नहीं आता

1 min 201 1 min 201

इस तिश्नगी का कोई हल नज़र नहीं आता

मेरा कोई रास्ता भी तो तेरे घर नहीं आता।


जिसे छोड़ दिया, उसे बस छोड़ ही दिया

फिर से मनाने का हमें हुनर नहीं आता।


वो दरिया है तो उसे मौजों का गुरूर है

हम समंदर हैं , हमें भी सबर नहीं आता।


जो दिया है , उतना ही वापस मिलता है

सूखे पेड़ों पर कभी गुल मोहर नहीं आता।


जब से सियासत मिली है जंगल की उसे

फिर कोई दूसरा जानवर नज़र नहीं आता।


नीयत खराब ना हो तो कुछ नहीं होता

यूँ ही कातिल के हाथ में खंज़र नहीं आता।


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