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AMAN SINHA

Tragedy

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AMAN SINHA

Tragedy

दंगे के बाद

दंगे के बाद

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क्या कभी तुम गुज़रे हो 

उन ख़मोश गलियों से 

जहाँ पिछली रात दंगे की रात थी 

      

चारों तरफ एक चीखती खामोशी छाई है 

तंग गलीयों की दीवार पर 

खून के धब्बे फैले थे 

कहीं किसी की टूटी चप्पल भागती नज़र आती है 

किसी के खून से सने पंजों के निशान 

दरवाजों पर मदद मांगती नज़र आती है 

            

कई मकान फुंके गए होंगे 

ना जाने कितनी दुकाने जलायी गई होंगी 

ना जाने कितने कफन और चिताओं की दुकानों की 

दिवाली चार महीने पहले ही आ गयी 

                  

अनाथ, विधवा, अपाहिजों की संख्या में 

एक दिन में हीं उछाल आ गया 

बाप,बेटा,पत्नी,माता, ना जाने कितने रिश्ते 

एक हीं रात में खो गए 

 क्या तुम सह पाओगे उस मासूम बच्चे की रुदन को 

जिसने अभी अभी अपनी माँ को मारता हुआ देखा हो 

                        

लेकिन इसका जिम्मेदार कौन है 

और क्या हमें इससे फर्क पड़ता भी है 

हम तुम सब अगले दिन अपने काम पर चल देंगे 

पेट का सवाल है बस यही तर्क देंगे 

 बस कुछ लोग दो एक दिन इस पर चर्चा करेंगे 

 अफसोस जताएँगे, मातम मनाएंगे और फिर 

 अगले हीं दिन फिर से अपनी राजनीति में लग जाएंगे।


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