STORYMIRROR

vinod mohabe

Abstract Tragedy

4  

vinod mohabe

Abstract Tragedy

बोलोना प्रभु

बोलोना प्रभु

1 min
270

बैल को दिया सिंग तुने

हाथी को दिया सुन्ड तुने

साप को दिया जहर तुने

बिच्छू को दिया डंक तुने

ये राज है क्या ये गहरा

बोलो ना प्रभु


शेर को दिया पंजा तुने

इन्सान को दिया दिमाख तुने

कमल खिलाया किचड में तुने

गुलाब को खिलाया कान्टो में तुने

ये राज है क्या ये गहरा

बोलो ना प्रभु


बडे से पेड पर छोटा सा फल

छोटे से बेल पर बडा सा फल

बडे से समुंदर में खारा पानी

छोटे से नदी में पिने का पानी

ये राज है क्या ये गहरा

बोलो ना प्रभु


जागने को दिन तुने बनाया

सोने के लिये रात बनाई

पैसे के लिये इन्सान बनाया

इन्सान के लिये पैसा बनाया

ये राज है क्या ये गहरा

बोलो ना प्रभु...


सोचने के लिये दिमाख बनाया

सुनने के लिये कान बनाया

बोलने के लिये मुह बनाया

देखने के लिये आख बनाई

फिर भी जज्बातो के लिये दिल बनाया

ये राज है क्या ये गहरा

बोलो ना प्रभु......


पेड को बनाया घास के लिये

घास को बनाया हिरण के लिये

हिरन को बनाया शेर के लिये

शेर को बनाया कीटक के लिये

कीटक को बनाया मिट्टी में मिलने के लिये

मिट्टी को बनाया पेड़ के लिये

ये राज है क्या ये गहरा

बोलोना प्रभु....


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract