STORYMIRROR

vinod mohabe

Others

4  

vinod mohabe

Others

क्यों उजाड़ता हैं दलित परिंदे के घोंसले को,,,

क्यों उजाड़ता हैं दलित परिंदे के घोंसले को,,,

1 min
254

बोल मड़के

तेरा क्या मज़हब है

पानी में भी कोई

तेरा क्या गर मज़हब है


आज भी तेरा आदम जमाने से

क्या कोई उसूल हैं 

दलित नहीं पी सकेगा पानी

ये क्या कोई कसूर हैं


जातिवाद के पलड़े में

क्या तू तोल रहा है 

इंसान हैं इंसान ही रहने दे

क्या इनके भेष को बदला रहा है


ये जात पात की कुरितिया हैं

सब मनुज मन की ये बेड़ियां है

तू भी नश्वर है मैं भी नश्वर हूं

फिर क्यूं ये दूरियां हैं


क्यों पूछता हैं उनका मज़हब

क्यों पूछता है उनकी जाती क्या है

सब एक मांस के लोथड़े है

हर कोई एक दिन माटी है


उजड़ते रोज़-दर-रोज़

कितने दलीत परिंदों के घोंसले हैं

ठाकुर, बामन और पठानों के 

क्या ये रोज़-दर-रोज़ के चोंचले हैं।

''''''''''''''''''''''''''''''':::::::''''''''''''''''

अब सुन मडके

बड़ी मुश्किल से मिली है ये आज़ादी

इसे जातियों में ना बांटो


हर धर्म के लोग हुए हैं शहीद

इसे धर्म के दंगों में ना बांटो


बाहर के दुश्मनों से सीमापर

लड़ते हैं हमारे सैनिक

तू दो घूंट पानी के लिए दुश्मन ना पाल


बोल मड़के

मिटा पायेगा ये आदम ज़माने की

जात पात की इस लड़ी को

यां रोज़-हर-रोज़ उजाड़ेंगा दलित परिंदे के घोंसले को।

 


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन