दिल का रिश्ता
दिल का रिश्ता
ना खून, ना जुनून, ना ही सुकून देखता हैं ये दिल का रिश्ता,
बस जहाँ मन से मन मिल जाये उसी का ये होकर रह जाता,
जब दिल से दिल मिलते तो भिन्न-भिन्न रिश्तों से सुशोभित हो जाता,
चाहे वो औलाद-अभिभावक, यार हो या रक्त सम्बन्ध वाला रिश्ता,
चंचल हो मचलता, क्रोधित हो बिफ़रता नाजुक हैं दिल का रिश्ता,
दिल को भाये कभी जानवर भी, कभी इंसानों के टुकड़े कर देता,
ना टुकड़े होते, ना आवाज़ आती जब टूटता ये दिल का रिश्ता,
हाँ, जाने अनजाने संकेत व आगाज़ अपने टूटने जरूर करता,
अब तो मतलबी हो पल-पल बदल जाता हैं दिल का रिश्ता,
सच्चे रिश्तों में भी मारकाट, धोखा, फरेब, स्वार्थ का बोलबाला होता।
